Tuesday, September 22, 2015

आहत समाज !!

 आहत समाज !!

धीरे धीरे ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारे समाज में कुछ बदलाव हो रहा है | बदलाव हमेशा बुरा नहीं होता , ना ही बदलाव की  हमेशा नकारात्मक प्रभाव होती है  | बदलाव एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो सदैव निरतंतर गति से गतिमान है |

सवाल ये नहीं की बदलाव होना चाहिए या नहीं , सवाल ये भी नहीं की क्यों हम इस बदलाव से इतने व्याकुल है | सवाल ये है की कही इस बदलाव का  बुरा प्रभाव इतना तो नहीं की हमारे समाज के सोच में कुछ विकृति लक्षणे नजर आने लगे |

मेरा मानना है की किसी भी बदलाव के अच्छे और बुरे दोनों ही प्रभाव समाज पर होते  है जिसे हर व्यक्ति विशेष अपनी नजरिये से देखता है और ग्रहण करता है | शायद यही समाज के उत्पत्ति में एक कारगर नियम भी होगी , तभी समाज में किसी को हम अच्छा और किसी को बुरा बोल देते है जबकि उसी बुरे के लिए हम बुरे हो जाते  है और उसी अच्छे के लिए हम अच्छे!!!

क्या है ये बदलाव? क्या बदल रहा है ? क्यों व्याकुल है भला हम ?

जरा सोचिये अगर कोई आपको ये बोले की आपको सुबह ४ बजे उठना है और २ घंटे योग करनी है ,फिर अपने नित्य क्रिया करम ६:३० बजे तक खत्म करनी है और फिर अपने दिन की शुरुआत करनी है | कही से भी ,कोई भी ये नहीं बोल सकता की किसी भी मनुष्य  के लिए उपर्युक्त बाते हानिकारक है या किसी भी तरह से ये दैनिक क्रिया आपके स्वस्थ को लाभ नहीं पहुंचाएगी |

मगर क्या आप इस बातो को मान पाएंगे ? आपको कैसा महसूस होगा अगर आपको ऐसा करने पे मजबूर कर दिया जाये ?  शायद फिर भी आप जल्दी सो के सुबह उठ के कर लेंगे |
लेकिन आपको अगर ये पता चले की ये काम किसी नियोजित प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है जिससे एक ख़ास वर्ग को आहत पहुँच रही है..फिर शायद आप इससे अपना विरोध व्यकत करे |

कुछ ऐसा ही वाकया आजकल महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है | महराष्ट्र सरकार ने दो दिन के लिए मांसाहार पर प्रतिबन्ध लगाया है | हाँ भाई क्यों ना लगाये , सरकार जो उनकी है | मुझे लगता है समय आ गया है जब हमें अपने शब्दकोश को बदलना चाहिए  और सरकार को अब संसार का प्रयायवाची बना देना चाहिए |

ये सही है है की सरकार की ये फ़र्ज़ बनती है की वो किसी ख़ास वर्ग के भावनाओ की क़द्र करे और उन सारी बातो का पूरा ख्याल रखे जिनसे उन्हें किसी भी प्रकार की आहत ना पहुंचे | परन्तु सरकार को इन सभी चीजो को  ख्याल रखते समय ये नहीं  भूलना चाहिए की सरकार एक संबिधान के निमित चलती है जो सर्वोपरि है | और संबिधान कही ये नहीं कहता की आप किसी ख़ास वर्ग के खुशी के लिए संबिधान के मूल पे आघात करे , जैसा की महाराष्ट्र सरकार करते दिख रही है |

ये सवाल उठता है की ,क्या पर्युषण जैनमार्गी पहली बार मना रहे है ? क्या जैन समाज मांसाहार का सेवन नहीं करते पर  क्या उसका विरोध करते है ? जैन समाज तो प्याज लहसुन का भी सेवन नहीं करती , फिर सरकार  को तो प्याज लहसुन पर भी प्रतिबन्ध लगा देना चैहिये | थोड़ा अच्छा भी होगा...प्याज जो इतना महंगा हो गया है |

मूल सवाल जो सोचने वाली है की क्या हमारा संबिधान इतना  कमजोर है कोई सरकार अपने अनुसार कोई भी कानून बनाये और देशवासियो को प्रतिबद्ध करे उसका पालन करने को |  बहुत ही शर्मनाक है ये , बहुत ही निंदनीय है ये सरकार की कदम |

जेहन में मेरे सवाल आती है की सरकार क्यों नहीं आजतक ईद और रमजान के पाक महीने में  सुवर(पिग/पोर्क) के सेवन पे प्रतिबन्ध लगाती है | क्या ईद मुस्लिमो के लिए जैन के पर्युषण से कम महत्वपूर्ण पर्व है? क्या सरकार को सिर्फ जैन समाज के भावनाओ की ही क़द्र है ? क्या सरकार मुसलमान भाइयो की नहीं है?

क्या सरकार समाज के सोच में एक बदलाव चाहती है?ऐसा बदलाव जिससे समाज अपने आप को एक दूसरे से अलग अपने धर्म के पैमाने से देखे | ऐसा बदलाव जहाँ समाज अपने हर काम को अपने धर्म से जोड़े , हर छोटे -बड़े चीज़ों को अपने अस्तित्व से देखे ।

शायद ये सही नहीं होगा । माना हमने पिछले  ६५ साल में तरक्की  के बहुआयामी बदलाव नहीं देखे है ,पर क्या तरक्की  का ये बदलाव समाज को धर्म के नाम पर बीछड़ाव कर के करना सही है ?

बहुत दुखद और निंदनीय है सरकार की ये पहल ।