Wednesday, October 21, 2015

धर्म : राजनीति का जरिया

धर्म : राजनीति का जरिया 






कभी कभी मुझे ऐसा महसूस  होता है की  हिन्दुस्तान क्यों एक धर्म निरपेक्ष देश है।


क्या ये एक ऐसी चीज़ है जिससे आज के दिन हमें हमारे समाज को विकशित करने में रुकावट आ रही है ? गूगल चाचा ने बताया की पुरे विश्व में अनेक विकशित , विकाशील और पिछड़े देश है जिनका कोई तय धर्म नहीं है और वो भी धर्म निरपेक्ष है , जैसे  कनाडा , अमेरिका नाइजीरिया और चीन।  

क्या होती है ये धर्म निरपेक्षता ? क्या होती  है इसकी अवधारणा ?  

साधारण  लहजे में समझे तो वो राष्ट्र जिसकी  संविधान किसी भी खास धर्म के विचारो  से नहीं प्रभावित होती और सभी धर्मो के अनुयायिओं को समानता से देखती है और समानता से अधिकार देती है , उसे हम धर्म निरपेक्ष राष्ट्र बुलाते है। 

विज्ञान का छात्र होने के कारन मैं आज तक समझ नहीं  पाया की धर्म क्या होती है और क्यों होती है ? शायद मुझे आज तक किसी ने बताया ही नहीं की  मेरा धर्म क्या है? हिन्दू कौन होते है मुस्लिम कौन होते है ? काफी दिवाली - ईद  मानाने के बाद  मुझे ईमानदारी से पता चला की मैं  हिन्दू हूँ  और मेरा दोस्त इरफ़ान मुस्लिम । मुझे तो हमेशा लगता था की जैसा मैं हूँ वैसा ही वो भी है। दोनों को क्रिकेट से काफी प्रेम है।  दोनों इंडिया को हमेशा जीतता देखना चाहते है।  स्कूल के दिनों में मेरा प्रिय विषय मैथ्स था तो उसका इंग्लिश। जैसा मेरा घर था वैसा ही उसका भी , जैसी मेरी माँ थी वैसी ही उसकी अम्मी भी थी , जिन्हे मैं चाचीजान  बुलाता था और वो हमेशा मुझे बेटा  कह के ही पुकारती थी।  उनके हाथ की ऑमलेट ब्रेड मुझे पसंद थी  और मेरी माँ की  बनायीं  हुई गुजिया और निमकी इरफ़ान  को।  उम्र के इस अंतराल में पता ही नहीं चल पाया की हममे सब कुछ सामान होते हुए भी एक चीज़ है जो हमें दो अलग पंक्तियों में  बिभाजित  करती है , और वो है उसका खान  होना और मेरा मिश्रा।  यानी की धर्म।  

पर तब तक शायद देर हो चुकी थी जब की मुझे मेरे दोस्ती से ऊपर धर्म का पाठ पढ़ाया जाता और खान और मिश्रा के अंतर को दिखाया जाता।  

मैं बिहार से आता हूँ और वहां हमें किसी ने धर्म का अंतर नहीं बताया। शायद यही हमारे देश की महानता है। 
पर जब आज मैं अपने नेताओ को धर्म की बात करते देखता हूँ तो ऐसा लगता है की क्या हमारा भारतवर्ष सही में महान है ?

बिहार के चुनाव के सन्धर्वः में देखे तो आज वहां हर नेता और हर पार्टी देश की इस महानता को खुलेआम शर्मशार कर रही है और हम जैसे मासूम लोग अपने नेताओ को अपना आदर्श मानकर उसे खुले मन से स्वीकृति भी दे रहे है।  

किसी मुस्लिम का गौमांस खा लेना तो किसी हिन्दू का सुवर का मांस मस्जिद में फ़ेंक देना ही आज की राजनीती बन गयी है।    कोई आज के दिन उस मांस की बात नहीं कर रहे जो दिन प्रतिदिन गलती जा रही।   कोई उस मांस की बात नहीं करता जो मतदान के दिन उसी नेताओ को और बड़ा नेता बना देगी। कोई उस मांश के अंदर छिपी उस भूक की बात नहीं करता जो उसे प्रतिदिन कमजोर करते ही जा रही है। 

हाँ भाई कोई करे भी तो क्यों ? हम भारतीय खासकर बिहारी इतने भावुक जो है , और इस बात को हमारे नेता बहोत खूबसूरती से समझते है और जानते है। वो जानते हैं की हमें थोड़ी सी  भावुकता की टॉनिक वो देंगे जिससे की हमारा मस्तिस्क निष्क्रिय हो जायेगा  और हम दो पंक्तियों में आसानी से बाँट जायेंगे।  

बहोत दुखद है ये पर आप  माने या न माने … यही सच्चाई भी है। 

पर मुझे ये भी विस्वास है की ये राजनीती छणिक है और कल जरूर बदलेगी।  शायर जायसी की दो पंक्तियाँ याद आती है की। .... 


उम्मीद-ए-शिफा भी नहीं बीमार को तेरे
अल्लाह से मायूस हुआ भी नहीं जाता


Tuesday, September 22, 2015

आहत समाज !!

 आहत समाज !!

धीरे धीरे ऐसा प्रतीत होता है जैसे हमारे समाज में कुछ बदलाव हो रहा है | बदलाव हमेशा बुरा नहीं होता , ना ही बदलाव की  हमेशा नकारात्मक प्रभाव होती है  | बदलाव एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो सदैव निरतंतर गति से गतिमान है |

सवाल ये नहीं की बदलाव होना चाहिए या नहीं , सवाल ये भी नहीं की क्यों हम इस बदलाव से इतने व्याकुल है | सवाल ये है की कही इस बदलाव का  बुरा प्रभाव इतना तो नहीं की हमारे समाज के सोच में कुछ विकृति लक्षणे नजर आने लगे |

मेरा मानना है की किसी भी बदलाव के अच्छे और बुरे दोनों ही प्रभाव समाज पर होते  है जिसे हर व्यक्ति विशेष अपनी नजरिये से देखता है और ग्रहण करता है | शायद यही समाज के उत्पत्ति में एक कारगर नियम भी होगी , तभी समाज में किसी को हम अच्छा और किसी को बुरा बोल देते है जबकि उसी बुरे के लिए हम बुरे हो जाते  है और उसी अच्छे के लिए हम अच्छे!!!

क्या है ये बदलाव? क्या बदल रहा है ? क्यों व्याकुल है भला हम ?

जरा सोचिये अगर कोई आपको ये बोले की आपको सुबह ४ बजे उठना है और २ घंटे योग करनी है ,फिर अपने नित्य क्रिया करम ६:३० बजे तक खत्म करनी है और फिर अपने दिन की शुरुआत करनी है | कही से भी ,कोई भी ये नहीं बोल सकता की किसी भी मनुष्य  के लिए उपर्युक्त बाते हानिकारक है या किसी भी तरह से ये दैनिक क्रिया आपके स्वस्थ को लाभ नहीं पहुंचाएगी |

मगर क्या आप इस बातो को मान पाएंगे ? आपको कैसा महसूस होगा अगर आपको ऐसा करने पे मजबूर कर दिया जाये ?  शायद फिर भी आप जल्दी सो के सुबह उठ के कर लेंगे |
लेकिन आपको अगर ये पता चले की ये काम किसी नियोजित प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है जिससे एक ख़ास वर्ग को आहत पहुँच रही है..फिर शायद आप इससे अपना विरोध व्यकत करे |

कुछ ऐसा ही वाकया आजकल महाराष्ट्र में देखने को मिल रहा है | महराष्ट्र सरकार ने दो दिन के लिए मांसाहार पर प्रतिबन्ध लगाया है | हाँ भाई क्यों ना लगाये , सरकार जो उनकी है | मुझे लगता है समय आ गया है जब हमें अपने शब्दकोश को बदलना चाहिए  और सरकार को अब संसार का प्रयायवाची बना देना चाहिए |

ये सही है है की सरकार की ये फ़र्ज़ बनती है की वो किसी ख़ास वर्ग के भावनाओ की क़द्र करे और उन सारी बातो का पूरा ख्याल रखे जिनसे उन्हें किसी भी प्रकार की आहत ना पहुंचे | परन्तु सरकार को इन सभी चीजो को  ख्याल रखते समय ये नहीं  भूलना चाहिए की सरकार एक संबिधान के निमित चलती है जो सर्वोपरि है | और संबिधान कही ये नहीं कहता की आप किसी ख़ास वर्ग के खुशी के लिए संबिधान के मूल पे आघात करे , जैसा की महाराष्ट्र सरकार करते दिख रही है |

ये सवाल उठता है की ,क्या पर्युषण जैनमार्गी पहली बार मना रहे है ? क्या जैन समाज मांसाहार का सेवन नहीं करते पर  क्या उसका विरोध करते है ? जैन समाज तो प्याज लहसुन का भी सेवन नहीं करती , फिर सरकार  को तो प्याज लहसुन पर भी प्रतिबन्ध लगा देना चैहिये | थोड़ा अच्छा भी होगा...प्याज जो इतना महंगा हो गया है |

मूल सवाल जो सोचने वाली है की क्या हमारा संबिधान इतना  कमजोर है कोई सरकार अपने अनुसार कोई भी कानून बनाये और देशवासियो को प्रतिबद्ध करे उसका पालन करने को |  बहुत ही शर्मनाक है ये , बहुत ही निंदनीय है ये सरकार की कदम |

जेहन में मेरे सवाल आती है की सरकार क्यों नहीं आजतक ईद और रमजान के पाक महीने में  सुवर(पिग/पोर्क) के सेवन पे प्रतिबन्ध लगाती है | क्या ईद मुस्लिमो के लिए जैन के पर्युषण से कम महत्वपूर्ण पर्व है? क्या सरकार को सिर्फ जैन समाज के भावनाओ की ही क़द्र है ? क्या सरकार मुसलमान भाइयो की नहीं है?

क्या सरकार समाज के सोच में एक बदलाव चाहती है?ऐसा बदलाव जिससे समाज अपने आप को एक दूसरे से अलग अपने धर्म के पैमाने से देखे | ऐसा बदलाव जहाँ समाज अपने हर काम को अपने धर्म से जोड़े , हर छोटे -बड़े चीज़ों को अपने अस्तित्व से देखे ।

शायद ये सही नहीं होगा । माना हमने पिछले  ६५ साल में तरक्की  के बहुआयामी बदलाव नहीं देखे है ,पर क्या तरक्की  का ये बदलाव समाज को धर्म के नाम पर बीछड़ाव कर के करना सही है ?

बहुत दुखद और निंदनीय है सरकार की ये पहल ।

Monday, December 1, 2014

SINGULARITY : a thought or a fact

SINGULARITY : a thought or a fact



“Singularity” …is this a scary dilemma, an unanswered thought which came out of a human brain...or from some part of any other XYZ  galaxy…
I thought closely and found till now apart from earth, life is not yet found anywhere…more closely I thought and found animals can’t give a shit about this thought.. So the only option I am left with is HUMANS. This is the only most developed species found on earth which can generate these ideas…and play around it.. J

I strongly believe ,Singularity will always remain a thought. and I have a straight forward answer for it is “An instruction based machine will always be instruction based till it has its own thought generation process”.

People can contradict on this thought and give me an example of, why bombs and explosives which was also invented by us are deadly and destructive for the whole world arena? Those are explosives and destructive matter.. and that should answer the above question.

I may not be  updated  but as far my knowledge if you ask computer to print “hello world “…..it still prints hello world.  And here I find my answer for singularity being a thought. Artificial intelligence is nothing but a virtual instruction based thought generated by HUMAN to make the computer more efficient and productive. It never tells as if computer will generate their own thought and speaking out loud…one day we would become slaves of the cyber world.

In corollary ,today the world has started giving a thought of “Back to Basic”. So articulating this in my way, we can come to a conclusion that artificial intelligence will always remain artificial and singularity will always be a thought or rather I would say a Ping-Pong game around which we humans would be playing back and forth. 

Sunday, April 20, 2014

How we are Hindu or Muslim...



Is it by Birth...



Or someone gave any application to the almighty...


or someone asked almighty that i want to be a born beef eater or a pork eater...who decided this...


I disagree......

why i am a Hindu...and why you are a Muslim....can anyone tell me....The answer is a big bullshit baseless NO.Who has decided this?....is it you or me or some meager folks of priests from an orthodox institution ... or was there a round table conference organised between Allah and Ishwar and GOD...to solemnize this mysterious thought...who will be what.Can you answer this to me???....Who can answer....??Come on...if you have guts...if you have a convincing answer...come and piss it off on my face....I know you wont come....because you don't have any....Not sure, Why don't you understand....or you don't want to understand....We take birth as human....Have you ever thought...that we are human...and only human...its the bad genes of our species who has made this demarcation of Hindu and Muslim...Have you ever thought,does a fleet of cows also has different religions?Have you ever thought,why Sun who gives light to the entire world is neither Hindu nor Muslim..Have you ever thought why Moon is worshiped by you both communities....You know why,because both Sun and Moon are life essentialsWe have to avoid this bad species...if required we have to fight against them and make them so weak,so they never gather a power to even think of such demarcations...Urge to the people...dont get driven...Find peace...distribute peace..and see......You wont be able to find ..any HINDU...any MUSLIM...ONLY HUMAN...VOTE A HUMAN...VOTE A GOOD HUMAN

Monday, June 24, 2013

Things we need to remember to have stories for our children......

It would be true to say that we are the most advanced and most vivacious generations so far...
A generation who has not once heard of cellphones and now exploring iPhone and iPad..
A generation who has on their infancy birthday was extremely delighted by a set of  new notebook,eraser and pencil as present  is now not that much touched  to have a i3 processor "lappy" as a b'day present when i5 is in race...

Time has progressed nd so do us.....there are lot of other things as well which we
 even dont remember now...but if u stress a bit in ur cerebrum u will definetly remember and will be highly amused...

in progress....